आरोपों की बरसात

 दिल्ली में पिछले कई वर्षों से आरोपों के बादल छाये रहे। बादलों के साये में करप्शन के खिलाफ अन्ना के नेतृत्व में आंदोलन चला जिसने केवल दिल्ली नहीं अपितु समूचे संसार को हैरान कर दिया जिन्हें निशाना बनाया जा रहा था उन्हें परेशान कर दिया। आरोपों की खबरों को अखबारों के पहले पन्ने पर जगह मिली। अपने मार्गदर्शक की इच्छा के विपरीत आरोपों की जंग में मुखर रहे कप्तान ने आरोपों के बादलों के मंद प्रकाश के तले नयी पार्टी का गठन कर दिया। पार्टी बनाने के बाद बड़ी बड़ी हस्तियों पर जोर शोर से आरोप लगाये जाते रहे लेकिन हर सप्ताह एक और राजनेता को निशाना बना कर कथित रूप से सच्चे-पक्के आरोप लगाये गये। किसी एक और हस्ती पर आरोपों की बौछार की गयी तो पिछले सप्ताह के घोषित आरोपी को भुला कर उसका खाता बंद कर दिया गया। कथित गंभीर और मनोरंजक आरोपलीला के माहौल में पार्टी की चर्चा यत्र,तत्र,सर्वत्र हुई तो इसी आकर्षण में कई पत्रकार और सामाजिक वर्करों ने पार्टी का हाथ थामा। नयी पार्टी के नेताओं ने खुद को पाक साफ, ईमानदार, चरित्रवान होने का जोरदार दावा देश के सामने पेश किया।  दावे के दमखम पर पार्टी ने 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ा और नतीजों ने सभी को स्तब्ध किया। 49 दिन की इस पार्टी की अल्पसंख्यक सरकार की ऑक्सीजन बंद किये जाने के बाद राजधानी ने एक साल तक राष्ट्रपति शासन देखा। इस बीच पार्टी के विधायक तोड़ने की कोशिशें खबरों में रहीं मगर किसी ने कोशिशों का सबूत देने का प्रयास नहीं किया।  पार्टी ने 2015 के विधानसभा चुनाव में देश की सबसे पुरानी पार्टी का भविष्य शून्य के लघु दायरे में कैद कर दिया और भगवा पार्टी को बस दो या तीन का सबक सिखाया। 2015 में फिर सरकार बनाने के बाद पार्टी ने पुराने आरोपों के संगीत की धुन पर नाचना बंद कर दिया। कुछ महीनों के बाद शायद  पार्टी ने सोचा कि क्यों न आरोपों का खेल इन हाउस खेला जाये। खेल शुरू हुआ तो कई साथियों को हफरा तफरी में बाहर का रास्ता दिखाया गया और पार्टी तथा सरकार के सर्वेसर्वा को कई लोगों ने तानाशाह कहा। आरोपों का खेल मंत्रीमंडल में खेला गया लेकिन पार्टी तथा सरकार में तेजी से सीढ़ियां चढ़ने वाले बर्खास्त मंत्री ने अपने कथित देवता पर आरोपों की मूसलाधार बरसात शुरू कर दी। ऐसा लगा कि वह पूरी हिम्मत और शिद्दत के साथ बेहद गंभीरता से आरोप लगा रहे हैं । वे आरोपों से भले ही सरकार के मुखिया का सीना छलनी नहीं कर सके परंतु उन्होंने करप्शन से लड़ने वाले सबसे बड़े योद्धा को मौन और निरुत्तर कर दिया। ईमानदारी के कथित देवता बचाव नहीं कर सके। बर्खास्त मंत्री रोज आरोपों की बरसात करते हुये गंभीरता की बलि दे बैठे। सरकार के मुखिया ने मौन रहते हुये अपने निवास पर लगातार जनता दरबार लगा साबित कर दिया कि वह अब शासन को चुस्त, दुरुस्त और तंदरुस्त करने में जुटे हैं। मौन में कितनी गंभीरता, ताकत होती है, समय बतायेगा।
मेट्रो की हेरिटेज लाइन


कहते हैं- देर आयद दुरुस्त आयद, जिसका काफी महीनों से था इंतजार, उसका जमीं के नीचे हो गया दीदार। जी हां शाहजहां के बसाये शाहजहांनाबाद में अब बने तहखानों में इस ऐतिहासिक शहर का दिल धड़का तो यूं लगा जैसे पुराने शहर को लगा 21वीं सदी का रौबदार तड़का। वक्त बदलता है, शहर आगे बढ़ता है, नयेपन का जादू चढ़ता है, जमाना चलता है। एसे में दिल्ली गेट से कश्मीरी गेट के बीच दिल्ली मेट्रो के अंडर ग्राउंड रूट का पर्दा हटना, ऐसा लगा कि जैसे पुराने शहर को ताजा तरीन महकती हवा और एक नायाब  तोहफा मिल गया हो। कहने को महज स्टेशन हैं चार मगर इससे फायदे हैं हजार। दिल्ली गेट, जामा मस्जिद, लाल किला और कश्मीरी गेट का जितना रिश्ता दिल्ली के एक करोड़ 87 लाख लोगों के साथ है उससे भी ज्यादा संबंध इतिहास और आजादी के संघर्ष के साथ भी है। इन स्टेशनों के पास से गुजरते और भीतर जाते ही आपको  पुरानी दिल्ली के धड़कते दिल और उसकी कहानी पर से पर्दा हटता महसूस होगा और आपकी नजरों के आगे इतिहास की घटनायें फिर जवान हो कर आपसे एकाकार करने लगेंगी। मेट्रो की हेरिटेज लाइन पर सफर करने के मायने होंगे कि आपने जाने अनजाने दिल्ली के कई सौ साल की हलचल को अपनी आंखों से पढ़ना, देखना और समझना शुरू कर दिया है। अतीत के गौरव और वर्तमान के सत्य तथा भविष्य के सपनों का तिरंगा आपके दिलो दिमाग पर लहरायेगा, दिल्ली की बीते दिनों की करवटों का आभास करायेगा और आपको सफर के झटकों के बगैर मेट्रो के टशन के लटकों के उल्लास से भी रूबरू करवायेगा। इस लाइन के खुल जाने से इतिहास का द्वार खुल गया है और दिल्ली दरबार के अलग थलग रहने वाले मुखिया को भी केन्द्र सरकार के एक अहम वजीर के साथ बैठकर राजधानी के हित में कुछ करने का मतलब समझ आया होगा। नयी हेरिटेज लाइन ने भूमिगत रास्ते से पुरानी दिल्ली की बादशाहत के मरकज लाल किले को नयी दिल्ली के मंडी हाउस तथा जनपथ और अब के राष्ट्राध्यक्ष के भवन एवं  दिल्ली विश्वविद्यालय के साथ सीधे जोड़ दिया है। इसके अलावा कश्मीरी गेट स्टेशन पर तीन लाइनों का संगम और लाइन बदलने का बड़ा जंक्शन बना दिया है। अब शाहजहांनाबाद के बाजार गुलजार होंगे, सड़कों पर भीड़ कम होगी तो पर्यटक अधिक आयेंगे, स्मारकों के संरक्षण के काम की जरूरत महसूस की जायेगी और शाहजहां की दिल्ली बिना किसी रोक टोक के नये जमाने का आलिंगन कर नवाचार को अपनाते हुये गालिब और जफर के अशआर बार बार लगातार सुनायेगी।


दिल्ली, देश, दुनिया—सत पाल 06-06-2017
शहीद रविन्द्र कुमार
इन दिनों देश की राजधानी दिल्ली में कई लोगों, संस्थाओं और नगर निगमों को स्वच्छता के क्षेत्र में काम करने और परिणाम दिखाने का जुनून चढ़ा हुआ है। कई सरकारी संगठनों और नगर निगमों पर अपना रैंक सुधारने या फिर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण की प्रति दिन की फटकार के कारण अनूठा दबाव भी बना हुआ है। दबाव होता है तो तेजी से काम होता है और लक्ष्य हासिल करने की जिद्द भी बढ़ती है। जब किसी काम में दिवानगी सिर चढ़ कर बोले तो लगता है कि अब कुछ न कुछ बदलाव आने वाला है। सरकारी संगठनों में तो अक्सर काम और लक्ष्यों को ज्यादातर हलके में लिया जाता है और कठिन समय में भी कई लोग अपने अवकाश लेने या अकारण घर बैठ जाने से संकोच नहीं करते मगर पुलिस सेवा में ऐसा नहीं चलता, अवकाश लेना हो तो पहले मंजूरी लेना जरूरी होता है। न फर्लो चलती है और न ही मन मर्जी। अर्जी दी तो मानने या नहीं मानने की मर्जी बॉस की, कहते हैं अर्जी मेरी मर्जी उनकी। इन लोगों को तो गंभीर समय में अवकाश रद्द कर काम पर वापस बुला लिया जाता है। अगर हम किसी ऐसे आदमी की बात करें जिसे कुछ न कुछ करने का जुनून हो तो मानना होगा कि वह चट्टानों, तूफानों, आंधियों, परिणामों से नहीं डरता और अपने संकल्प में बाधा नहीं आने देता भले ही कितनी बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़े। ऐसे ही एक आदमी का नाम था रविन्द्र कुमार जिसका मंत्र था- स्वच्छता परमो धर्म। इस ई रिक्शा चालक को यह बर्दाश्त नहीं था कि कोई आदमी देश की राजधानी में सड़क पर दीवार की तरफ खड़ा होकर ईज करता दिखाई  दे और खुले में दबाव भरा नित्य कर्म करता  दिखे। एक दिन सड़क पर दीवार की ओट में नंबर वन कर रहे दो लोगों को जब रविन्द्र कुमार ने रोका तो उसे शायद यह मालूम नहीं होगा कि उसकी आखिरी रात दस्तक दे रही है। उन बिगडैलों ने रात में रविन्द्र को पीट पीट कर यमराज के हवाले कर दिया मगर स्वच्छता के परवाने का जज्बा नहीं समझा। क्या हमें रविन्दंर को शहीद नहीं मानना चाहिये, क्या देश में सबसे उदार दिल्ली सरकार को उसके परिवार को दस करोड़ की अनुग्रह राशि नहीं देनी चाहिये। जब उदार सरकार दूसरे राज्यों के कथित शहीदों की झोलियां भर देती है तो रविन्द्र के लिये कैसी मजबूरी है। पी एम को भी रविन्द्र कुमार का जिक्र मन की बात कार्यक्रम में करना चाहिये और बिग बी को भी अपने अभियान में इस शहीद को नमन करना चाहिये। जज्मे को सलाम करो, न झुको न डरो।
पानी का दर्द
कर्नाटक के पावागाडा तालुक के निवासियों का जीवन मुसीबतों से भरा है क्योंकि उन्हें हर रोज आंध्र प्रदेश जा कर चिकन्नाडुका से पीने और दूसरी जरूरतों के लिये पानी भर कर लाना जरूरी होता है। दस किलोमीटर की इस यात्रा में उनका हमसफर होता है एक साइकिल और वहां पानी की लाइन में इंतजार का वक्त गुजारने का साथी होता है दर्द। उनका यही महज काम है क्योंकि और कुछ करने का उनके पास कोई समय ही नहीं बचता। हे भगवान,सब परेशान।
दो पहलू
आयरलैंड में भारतीय मूल के डाक्टर महाराष्ट्र के 38 साल के लियो वराडकर पी एम बने हैं। जब विदेशों में भारतीय मूल के किसी आदमी को ऐसा पद मिलता है तो हमें अच्छा लगता हैं। वराडकर स्व घोशित समलैंगिक हैं। उधर मलेशिया सरकार ने समलैंगिकता के विरोध में बेहतरीन वीडियो बनाने वाले को एक हजार डॉलर का इनाम देने का एलान किया है। समझा होते हैं न दो पहलू।
दिल्ली, देश, दुनिया---सत पाल 30-06-2017
दुरुस्त आयद
कहते हैं- देर आयद दुरुस्त आयद, जिसका काफी महीनों से था इंतजार, उसका जमीं के नीचे हो गया दीदार। जी हां शाहजहां के बसाये शाहजहांनाबाद में अब बने तहखानों में इस ऐतिहासिक शहर का दिल धड़का तो यूं लगा जैसे पुराने शहर को लगा 21वीं सदी का रौबदार तड़का। वक्त बदलता है, शहर आगे बढ़ता है, नयेपन का जादू चढ़ता है, जमाना चलता है। एसे में दिल्ली गेट से कश्मीरी गेट के बीच दिल्ली मेट्रो के अंडर ग्राउंड रूट का पर्दा हटना, ऐसा लगा कि जैसे पुराने शहर को ताजा तरीन महकती हवा और एक नायाब  तोहफा मिल गया हो। कहने को महज स्टेशन हैं चार मगर इससे फायदे हैं हजार। दिल्ली गेट, जामा मस्जिद, लाल किला और कश्मीरी गेट का जितना रिश्ता दिल्ली के एक करोड़ 87 लाख लोगों के साथ है उससे भी ज्यादा संबंध इतिहास और आजादी के संघर्ष के साथ भी है। इन स्टेशनों के पास से गुजरते और भीतर जाते ही आपको  पुरानी दिल्ली के धड़कते दिल और उसकी कहानी पर से पर्दा हटता महसूस होगा और आपकी नजरों के आगे इतिहास की घटनायें फिर जवान हो कर आपसे एकाकार करने लगेंगी। मेट्रो की हेरिटेज लाइन पर सफर करने के मायने होंगे कि आपने जाने अनजाने दिल्ली के कई सौ साल की हलचल को अपनी आंखों से पढ़ना, देखना और समझना शुरू कर दिया है। अतीत के गौरव और वर्तमान के सत्य तथा भविष्य के सपनों का तिरंगा आपके दिलो दिमाग पर लहरायेगा, दिल्ली की बीते दिनों की करवटों का आभास करायेगा और आपको सफर के झटकों के बगैर मेट्रो के टशन के लटकों के उल्लास से भी रूबरू करवायेगा। इस लाइन के खुल जाने से इतिहास का द्वार खुल गया है और दिल्ली दरबार के अलग थलग रहने वाले मुखिया को भी केन्द्र सरकार के एक अहम वजीर के साथ बैठकर राजधानी के हित में कुछ करने का मतलब समझ आया होगा। नयी हेरिटेज लाइन ने भूमिगत रास्ते से पुरानी दिल्ली की बादशाहत के मरकज लाल किले को नयी दिल्ली के मंडी हाउस तथा जनपथ और अब के राष्ट्राध्यक्ष के भवन एवं  दिल्ली विश्वविद्यालय के साथ सीधे जोड़ दिया है। इसके अलावा कश्मीरी गेट स्टेशन पर तीन लाइनों का संगम और लाइन बदलने का बड़ा जंक्शन बना दिया है। अब शाहजहांनाबाद के बाजार गुलजार होंगे, सड़कों पर भीड़ कम होगी तो पर्यटक अधिक आयेंगे, स्मारकों के संरक्षण के काम की जरूरत महसूस की जायेगी और शाहजहां की दिल्ली बिना किसी रोक टोक के नये जमाने का आलिंगन कर नवाचार को अपनाते हुये गालिब और जफर के अशआर बार बार लगातार सुनायेगी।
सत्कर्म गये कहां
सत्कर्म ढूंढते रह जाओगे मगर हर शहर, हर डगर पर दास्तान ए दुष्कर्म सुनते, देखते रह जाओगे। कहीं दिल्ली की निर्भया के दर्द वाली दिल्ली, कभी रोहतक, कभी जेवर, कभी बुलंदशहर, कभी मुरथल , कभी बंगलौर क्या है यही है आज का सत्य और नया दौर। इस अंधी हवस और अंधी दौड़ को रोकना होगा वरना हमारा भविष्य दांव पर लगा होगा। कन्या पूजन करने वाला देश किस दिशा में जा रहा है, उत्तर की देश प्रतीक्षा कर रहा है।
क्रिकेट की ओवर डोज
आईपीएल के लगभग दो महीने के शोर शराबे के बाद अब पहली जून से 18 जून के बीच इंगलैंड में आठ देशों के बीच 15 वन डे मैचों कीच चैंपयिंस ट्रॉफी प्रतियोगिता शुरू हो रही है। भारत भी इसमें शामिल है। क्या बात है कि प्लेयर हमारे थकते नहीं हैं। कुछ तो करो रहम , किसी और खेल को भी दे दो सहारा तथा दम। हम 15 देशों के खेल के दीवाने बने हैं मगर 150 से अधिक देशों के खेल फुटबाल में अब भी जीरो हैं। 




दिल्ली में नारेबाजी



दिल्ली में नारेबाजी- सत पाल
 देश की राजधानी दिल्ली में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में की गयी नारेबाजी को लेकर पूरे देश में जितनी चिंता होनी चाहिये थी , न जाने क्यों, उतनी दिखायी नहीं देती। बहुत अच्छा होता अगर इस मुद्दे को सियासत में सोने के अंडे देने वाली मुर्गी नहीं बनने दिया जाता। हैरानी की बात है कि दिल्ली में ऐसे नारे सुनायी दिये जिनकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। जिस तरह नारे लगाये जा रहे थे, लगता था कि पूरी तैयारी के साथ सब कुछ किया गया होगा। इन लोगों ने जिस की भी शह पर नारे लगाये या फिर किसी पक्ष ने किसी दूसरे पक्ष को मुसीबत में डालने के लिये नारे लगवाये, यह जांच का मुद्दा है और इसकी बारीकी से छानबीन करवायी जानी चाहिये ताकि ऐसी बेशर्म शरारत करने वालों को कानून के हवाले किया जा सके। इससे पहले तो जरूरत यह थी कि समूचा देश और तमाम राजनीतिक पार्टियां इस घटना की जबर्दस्त निंदा करतीं । इसके अलावा देश के सभी लोगों ओर सभी संगठनों से इस तरह की नारेबाजी के हक में या खिलाफ कोई प्रदर्शन नहीं करने की जोरदार अपील करतीं। ऐसा हो जाने से एक चिंगारी को आग बनने से रोका जा सकता था। हमारे देश की अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिये भी यह अच्छा होता कि वे इस घटना के वीडियो न दिखाते, बार बार नहीं दिखाते, खबरों को बड़ा आकार नहीं देते। अगर ऐसा होता तो कम से कम ऐसी घटना किसी दूसरे शहर और किसी दूसरे स्थान पर नहीं होती। ऐसा नहीं हुया तभी तो एक दूसरे पर आरोप लगाये जा रहे हैं, एक दूसरे के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं,  अलग अलग पार्टियों के हितैषी संगठन तथा उग्र संगठन सक्रिय हैं, आपस में अदालत और घटना स्थल पर झगड़े हो रहे हैं।  अब माहौल को गर्म कर दिया गया है। ऐस मुद्दे पर धारदार, उकसाऊ बयानों ने भी आग में घी डालने का काम किया है। जहां तक देश विरोधी नारे लगाने की बात है, अगर ऐसा करने वाले स्पष्ट दिखायी दे रहे हैं तो उन पर कानूनी एक्शन लेने की आलोचना करना तो सही नहीं माना जा सकता। जहां तक सवाल इस बात का है कि घटना के पीछे कौन कौन थे और किस किस ने किसी को बदनाम करने के लिये तोड़ मरोड़ कर या सही वीडियो बनाये या देश के अमन, चैन, खुलूस बिगाड़ने के लिये ऐसा किया, उनकी शिनाख्त कर उन पर कार्रवाई बाद में की जा सकती है। खुले आम सामने नारे लगाते दिख रहे लोगों पर एक्शन लिये जाने की आलोचना करने का किसी को हक नहीं दिया जा सकता, भले ही वह कोई नेता हो, मंत्री हो या मानवाधिकार संगठन से जुड़ा कोई सदस्य हो। देश के विरोध में और देश के टुकड़े टुकड़े करने के बारे नें नारे लगाने या ऐसा ही लिखने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कभी नहीं माना जा सकता, इस पर सभी की एक राय होना जरूरी है।
        
दास्तान-ए-झाड़ू – सत पाल

देश की राजधानी दिल्ली में अचानक 2013 के विधान सभा चुनाव से पहले झाड़ू का अवतरण हुआ। एक नई पार्टी ने पांचवी विधान सभा का चुनाव सभी सीटों पर लड़ने के लिये मुख्य चुनाव अधिकारी से एक राज्य स्तर का चुनाव निशान आबंटित करने का अनुरोध किया और यह अनुरोध आसानी से मान लिया गया। इस फैसले पर सभी को हैरानी तो हुयी और कहा जाने लगा कि बिना किसी अस्तित्व के पार्टी को निशान दिया जा रहा है। इस के अलावा यह भी कहा गया कि नव गठित आम आदमी पार्टी को शायद ही तीन चार सीटों पर जीत मिलेगी और चौबे जी गये छब्बे बनने गये और दुबे बन कर लौटे वाली हालत बनेगी। और निशान जब झाड़ू मिला तो इसे ले कर भी जग हंसाई होने लगी। नयी पार्टी नये निशान ने जिस तरह 2013 में झाड़ू हिला हिला कर , झाड़ू दिखा दिखा कर प्रचार किया तो लोगों की आंखें खुलने लगीं । इस चुनाव में नयी पार्टी ने दिल्ली में शुरू से जमीं दोनों पार्टियों को नाकों चने चबवा दिये और दिल्ली में चुनावी मुकाबले में तीसरी ताकत बन गयी। तीसरी पार्टी साकार करने का जो काम खुराना नहीं कर सके वह काम केजरीवाल ने कर दिखाया। अबके झाड़ू ही चलेगी का ऐलान, यूं लगा रणभेरी बनने लगा।  पहली बार दिल्ली राज्य के चुनाव में त्रिशंकु विधान सभा का नजारा दिखायी दिया। नयी पार्टी को 28 सीटें और  लगातार 15 साल राज करने वाली सबसे पुरानी कांग्रेस को केवल आठ सीटें तथा बहुमत का सपना देख रही भाजपा की तो वह हालत कर दी जिसे पंजाबी में कहते हैं—नाती धोती रह गयी । भाजपा न तो जोड़ तोड़ कर सरकार बनाने की हिम्मत कर सकी और न ही सब से बड़ी पार्टी बनने पर गर्व कर सकी और 32 सीटें तथा दो सहयोगी सदस्य होने के बावजूद अपने जर्जर शरीर में प्राणवायु नहीं डाल सकी। दिल्ली के लिये ये झाड़ू की मार थी।  2015 के विधान सभा चुनाव में तो झाड़ू का कहर चला और कोंग्रेस के सारे के सारे तंबू उखड़ गये और भाजपा को आंसू पोंछने के लिये इतनी सीटें मिलीं जितनी परिवार नियोजन के दिनों में कहा जाता था-  दो या तीन बस। दिल्ली में जब झाड़ू चला तो तबदीली आयी और जब सफाई कर्मचारियों ने अपने आंदोलन में झाड़ू से कुछ दिन का तलाक घोषित किया तो दिल्ली में सड़ांध का दायरा बढ़ने लगा और इसको लेकर राजनीति गर्म हो गयी। झाड़ू नहीं चलने से दिल्ली सरकार को भी दिन में तारे दिखायी देने लगे और लगा कि कहीं विफलता का चेहरा न देखने पड़े।  जब झाड़ू का इस्तेमाल बंद हो गया तो दिल्ली कूड़ा घर बन गयी और क्या सरकार, क्या अदालत सभी को चिंता होने लगी और इसके बाद हड़ताल या तो खत्म हुयी या फिर इसके तेवर ढीले होने लगे। ऐसे में एक बार फिर झाड़ू चलाने की जरूरत है ताकि कूड़े के पर्वत हटाये जो सकें। इस काम को जल्दी से जल्दी अंजाम देने के लिये यह जरूरी है कि हर आदमी, भले ही वह किसी पार्टी का हो या किसी भी पार्टी का न हो, सड़ रही दिल्ली से कूड़ा कर्कट हटाने के लिये अपने हाथों में कस कर झाड़ू थामे और दिल्ली को साफ सुथरा बनाये। यह है झाड़ू की एक साल की अमर कहानी।

    
डर्टी पॉलिटिक्स---सत पाल
       देश की राजधानी दिल्ली की सियासत का म्यार यानि स्तर इतनी तेजी से गिर जायेगा, ऐसा कभी किसी ने सोचा नहीं था। आखिर दिल्ली कहां से कहां तक पहुंच गयी है, यह सब देख कर किसी को विश्वास ही नहीं होता। कहते हैं कि जब किसी को उम्मीद से ज्यादा और समय से पहले बहुत बड़ी कामयाबी मिलती है तो उसका अंदाज, मिजाज, स्वभाव, हाव भाव, काम करने की शैली और प्रतिक्रिया करने के साधारण तरीके में तेजी से परिवर्तन आने लगता है भले ही वह कोई आदमी हो या फिर कोई राजनीतिक पार्टी। आज के दिल्ली के सियासी हालात को देख कर बस इतना कह देना ही काफी है। समझदार लोगों के लिये इतना पर्याप्त है और वे इसी के आधार पर सोच विचार कर सकते हैं तथा अपना निष्कर्ष भी निकाल सकते हैं। राजधानी में दो पक्ष ऐसी अभूतपूर्व जंग में उलझ गये हैं कि अब उन्हें इसके रणक्षेत्र से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा । इस वजह से दिल्ली की न केवल जगहंसाई हो रही है अपितु सरकारी काम काज और विकास पर विपरीत असर भी पड़ रहा है यानि सोचा तो था कि अच्छा होगा, सुधार होगा मगर दिख रहा है कि दिनबदिन बिगाड़ ओर उजाड़ हो रहा है। हर कदम पर टकराव है, सियासत है, आरोप- प्रत्यारोप हैं, कटुता है, शत्रुता है, नफरत है, शरारत है, असहयोग है, अविश्वास है, बयानबाजी है, हवाबाजी है, जनता के साथ किये वायदों के साथ दगाबाजी है, बदमिजाजी है, उलट पलट निर्णय लेने की आजादी है। इन सबसे दिल्ली में डर्टी पॉलिटिक्स का बोलबाला है और कुछ नहीं मालूम कि आगे क्या होने वाला है। इस अजीब जंग से अधिकारी परेशान हैं और दिल्ली से बाहर तैनाती लेने को बेकरार हैं, तैयार हैं। केवल दिल्ली में यह होता है कि एक पद पर दो दो अधिकारी काम करें, एक ही सरकार में किसी नियुक्ति को जंग में शामिल एक पक्ष रद्द करे तो दूसरा बहाल कर दे, अधिकारों की लड़ाई अमर्यादित तरीके से लड़ी जाये, सत्य ओर ईमानदारी की नयी नयी परिभाषाएं गढ़ी जायें, स्थापित संस्थाओं और परंपराओं को खुली चुनौती दी जाये, प्रचंड बहुमत को कुछ भी करने का लाइसेंस मान लिया जाये और जो पहले कभी न हुआ हो वह करने में गर्व महसूस किया जाये। झुग्गी बस्तियों में  किसी मासूम की मौत  और जन सभा में किसी किसान की आत्म हत्या पर भी सियासत होने लगी है। ये जुनून दिल्ली को कहां तक ले जायेगा , भगवान को भी शायद कुछ अंदाजा न हो। और अब तो बात शब्द खराब होने तथा कर्म खराब होने की हो रही है। यह तो डर्टी पॉलिटिक्स का कोई नया अध्याय दिखायी देता है।
       हिमाचल प्रदेश में प्रदर्शनकारियों को लेने के देने पड़ गये। शिमला में नेशनल हेराल्ड मामले में विरोध प्रदर्शन करने गये कांग्रेसजनों में बहुत जोश था और उन्होंने पी एम का पुतला भी जलाया। सब ठीक चल रहा था मगर जब पुतले में लगायी गयी आग प्रदर्शनकारियों तक पहुंच गयी तो कई कार्यकर्त्ता बुरी तरह झुलस गये, अफरा तफरी मच गयी और झुलसे लोगों को अस्पताल ले जाया गया। कहते हैं कि तेज हवा के झोंकों से पुतले में लगी आग की पकड़ में प्रदर्शन करने वाले भी आ गये। आग किसी का लिहाज तो नहीं करती भले ही किसी को लेने के देने न पड़ जायें।