रेल पटरी पर दबंग

रेल की पटरी पर दबंग

दबगाई का क्रूर नज़ारा दिख रहा है रेल पटरियों पर . इन लोगों ने अब दूध की सप्लाई बंद करने की धमकी देकर मासूम बच्चों के मुंह से दूध छीन लेने की तैयारी कर ली है . इतना ही नहीं दबंग का एक नया पहलू यह है कि प्यासे के पास ही कुआँ चल कर आये . दबंग लोगों ने एक ऐसी घोषणा की है कि वह अपनी मांगों पर बातचीत करने के लिए न तो प्रदेश की राजधानी जायेंगे और न ही किसी नेता या अधिकारी के पास. अगर किसी ने बात करनी है तो वह उनके पास चल कर रेल पटरी पर ही आये . अपनी मांग पर जोर देने के लिए दबंग आन्दोलनकारियों ने रेल पटरी को अपना ठिकाना , आशियाना बना लिया है. इसी स्थान पर बनाया जा रहा है खाना और साथ की जगह बन गया है खुला पाखाना. ये लोग इस तरह रेल पटरियां खींच खींच कर उखाड़ फैंक रहे है जैसे ये पटरियां नहीं अपितु रावण की लंका में अशोक वाटिका में लगे पेड़ , पत्ते या फल हों.

लोकतंत्र में आन्दोलन करने की छूट है. अपनी बात रखने और मांग करने और उस पर जोर देने के लिए वाजिब तरीके अपनाने की परिपाटी है मगर आन्दोलन और धरने को adiyalpan और बेशर्मी की पराकाष्ठा में बदलने का किसी को भी हक नहीं है. हठधर्मी जब सीमाओं का उल्लंघन करने लगती है तो इसे घर , परिवार में भी बर्दाश्त नहीं किया जाता . हठ में जब कोई तस से मस नहीं होता तो टकराव टाला नहीं जा सकता . ऐसे में हठधर्मियों को नुकसान का सामना करना पड़ता है. लोकतंत्र में अनशन , आन्दोलन करने का अचूक अस्त्र हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने दिया था . ऐसे आंदोलनों में शांति बनाये रखने और सुलह सफाई से हल निकालने के लिए बातचीत की हमेशा गुंजाईश बनी रहती थी. ऐसे आंदोलनों में न तो हठधर्मी के अंश हुआ करते थे और न ही बेशर्मी के .

रेल पटरी पर डटे दमंगों के इरादे हो सकता हैं अपने समुदाय के लिए अच्छे हों मगर उनके व्यव्हार से तो बेवजह राजस्थान बदनाम हो रहा है . ऐसे आन्दोलनकारियों के पास लोगों के निर्बाध आवागमन के संवैधानिक अधिकार के उल्लंघन का क्या हक है . रेल पटरी पर कड़ाके की सर्दी में अलाव जलाकर बुजुर्गों की पिकनिक , दर्जनों गाड़ियों के हजारों मुसाफिरों को ठण्ड के दिनों में रास्ते में अटके हुए भूख से परेशानी , कई यात्रियों की इस वजह से इंटर वियु की तरीख निकल जाने तथा ट्रेन और विमान मिस होने, रेल पटरियों को उखाड़ देने, अटके बीमार यात्रियों के दम तोड़ जाने और अहंकार के नशे में आन्दोलनकारियों की बेहूदी हरकतों को किस पैमाने पर लोकतान्त्रिक कहा जा सकता है ? बेशर्मी और हठधर्मिता की यह हवा कहीं दूसरे राज्यों और शहरों तक पहुंचे इससे पहले इस पर समुचित और संवैधानिक तरीके से लगाम लगाया जाना ज़रूरी है.

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